भारत और ताइवान के लिए सांस्कृतिक कूटनीति


भारत के उत्तर पूर्व में स्थित राज्य मेघालय की गारो जनजाति के युवा लड़का और लड़की (Vishma Thapa/Wikipedia Commons)

डॉ. सम्पा कुंडू द्वारा/अनुवादक:काश्वी चतुर्वेदी

सांस्कृतिक कूटनीति भारत और ताइवान के लिए रणनीति-संबंधी, सॉफ्ट पावर और पहचान से जुड़े कारणों से बेहद महत्वपूर्ण है। सीमित राजनीतिक-राजनयिक संबंधों के कारण यह भारत-ताइवान द्विपक्षीय संबंधों में एक अहम तत्व के रूप में उभरी है। इस संदर्भ में सांस्कृतिक कूटनीति एक शक्तिशाली, कम जोखिम और अधिक प्रभाव वाला साधन है।

यह भारत के लिए कई उद्देश्यों की पूर्ति करती है। सांस्कृतिक आदान-प्रदान, फिल्म महोत्सव, योग कार्यक्रम, बौद्ध संबंध और शैक्षणिक सहयोग के माध्यम से भारत अपनी सभ्यता की विरासत, बहुलवाद और आध्यात्मिक गहराई को प्रस्तुत करता है। दूसरी ओर, ताइवान अपने लोकतांत्रिक मूल्यों, रचनात्मकता और ऐतिहासिक विशिष्टता को प्रदर्शित करता है। इससे दोनों देशों को अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि मजबूत करने और लोगों के बीच विश्वास बनाने में मदद मिलती है।

सभ्यतागत और धार्मिक विरासत के अलावा, भारत और ताइवान सांस्कृतिक कूटनीति और जन-जन के संबंध के समकालीन माध्यमों पर जोर दे रहे हैं। छात्र विनिमय, साहचर्य और ताइवान में भारतीय सांस्कृतिक केंद्रों की स्थापना दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक साझेदारी की ओर ले जा रही है। सांस्कृतिक कूटनीति अक्सर आर्थिक और प्रौद्योगिकी साझेदारी के द्वार भी खोलती है। जहाँ एक तरफ भारत व्यापार और निवेश के स्रोतों में विविधता लाना चाहता है वहीं दूसरी तरफ ताइवान क्षेत्रीय तनावों के बीच विश्वसनीय साझेदारों की तलाश करता है| तब सांस्कृतिक समझ दोनों समाजों के बीच मानसिक और राजनीतिक दूरी को कम करती है।

सांस्कृतिक कूटनीति जनमत को आकार देने में भी मदद करती है और जनमत विदेश नीति निर्माण में सहायक होता है। सांस्कृतिक पहलें बिना राजनयिक नाराज़गी या प्रतिकूल प्रतिक्रिया उत्पन्न किए गहरे जुड़ाव के लिए जन समर्थन का निर्माण करती हैं,। सांस्कृतिक कूटनीति एक शांत शक्ति गुणक के रूप में कार्य करती है। यह भारत और ताइवान को एक मजबूत साझेदारी बनाने, राजनयिक बाधाओं को पार करने और साझा मूल्यों, विरासत और मानवीय संबंधों के माध्यम से सद्भावना को बढ़ावा देने में सक्षम बनाती है।

“सांस्कृतिक कूटनीति अक्सर आर्थिक और प्रौद्योगिकी साझेदारी के द्वार खोलती है।”

-डॉ. संपा कुंडू

जन-केंद्रित कूटनीति

जन-केंद्रित सांस्कृतिक कूटनीति नागरिकों के बीच प्रत्यक्ष संवाद के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय संबंध और विश्वास बनाने पर केंद्रित है, न कि केवल सरकारों के बीच। यह केवल राजनयिक स्तर की वार्ताओं से आगे बढ़कर छात्रों, कलाकारों, विद्वानों, आध्यात्मिक गुरुओं और समुदायों को शामिल करती है, जो आपसी समझ और जमीनी स्तर के संबंधों को बढ़ावा देती है। यह विभिन्न क्षेत्रों में लोगों से लोगों के संपर्क को प्रोत्साहित करती है और साझा पहचान बनाने में सहायक होती है।

नागालैंड राज्य की एओ जनजाति की एक महिला टेपेरेम्सु पहने हुए, जो भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में एक पारंपरिक एओ नागा स्कर्ट है। ((Allery Slideshow Viswema/Wikimedia Commons)

भारत-ताइवान संबंधों में पूर्वोत्तर भारत

भारत की “एक्ट ईस्ट नीति” में पूर्वोत्तर भारत को विशेष स्थान दिया गया है। दूसरी ओर, ताइवान की “न्यू साउथबाउंड नीति” में पूर्वोत्तर भारत को दक्षिण एशिया में प्रवेश द्वार के रूप में देखने और विस्तार करने की क्षमता है। इस भू-रणनीतिक दृष्टिकोण के अलावा, पूर्वोत्तर भारत और ताइवान के बीच सांस्कृतिक जड़ें काफी मजबूत हैं। पूर्वोत्तर भारत के कई जातीय समूह (जैसे ताई-खामती, ताई-फाके, अहोम) का दक्षिण-पूर्व एशिया और पूर्वी एशिया से ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध है। 

अरुणाचल प्रदेश, असम और त्रिपुरा में थेरवाद और महायान बौद्ध परंपराएं प्रचलित हैं और ताइवान में भी समान प्रथाएं मिलती हैं, जिससे आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान सहज और सार्थक बनता है। यदि बुनियादी ढांचा और संपर्क बेहतर हो जाए तो ताइवान के पर्यटक भारत के बौद्ध पर्यटन स्थलों की अधिक यात्रा कर सकते हैं।

नीति निर्माताओं को पूर्वोत्तर भारत की युवा आबादी को भी ध्यान में रखना चाहिए और उनकी आकांक्षाओं को नीतियों में शामिल करना चाहिए। उन्हें फिल्म निर्माण, एआई और तकनीकी प्रशिक्षण, उच्च शिक्षा और भाषा प्रशिक्षण जैसी पहलों में शामिल किया जाना चाहिए। ये पहल उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर करियर बनाने में मदद करेंगी।

ताइवान की अटायाल जनजाति की पोशाक। (यिलान प्रथम नागरिक द्वारा/Own work, CC BY-SA 4.0, Wikimedia Commons))

नैतिक और दीर्घकालिक पर्यटन को बढ़ावा देना

नैतिक और दीर्घकालिक पर्यटन स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाने, सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत को संरक्षित करने और पर्यावरणीय नुकसान को कम करने वाले जिम्मेदार यात्रा को बढ़ावा देने की क्षमता रखता है। भारत और ताइवान जैसे देशों में, जो स्वदेशी संस्कृतियों और जैव विविधता से समृद्ध हैं, यह मॉडल समावेशी विकास को बढ़ावा दे सकता है।

समुदाय द्वारा संचालित होम-स्टे (अर्थात एक प्रकार का आवास जहां यात्री किसी स्थानीय व्यक्ति के घर में उनके साथ ही रहते हैं) का समर्थन करके, पर्यावरण-अनुकूल ढांचे को बढ़ावा देकर और पर्यटन अनुभवों में पारंपरिक ज्ञान को शामिल करके, दोनों देश सुनिश्चित कर सकते हैं कि पर्यटन स्थानीय लोगों को लाभ पहुंचाए और नाजुक पारिस्थितिक तंत्र की रक्षा करे।

दोनों देशों को नैतिक प्रचार, पारदर्शी राजस्व-साझाकरण और आगंतुक शिक्षा में निवेश करने की आवश्यकता है ताकि सम्मानजनक जुड़ाव को और मजबूत किया जा सके। भारत और ताइवान संयुक्त पहलें विकसित कर सकते हैं जैसे सांस्कृतिक आदान-प्रदान, साझा विरासत सर्किट और टूर ऑपरेटरों के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रम, जिससे वे सतत पर्यटन में वैश्विक नेता के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर सकें।

ताइपेई में 99 साल पुराने बौद्ध शांडाओ मंदिर के गर्भगृह के अंदर। (वीनस उपाध्याय)

कथावाचक क्लबों को बढ़ावा देना

कथावाचक—अक्सर बुजुर्ग, संगीतकार, बुनकर, नर्तक या स्थानीय इतिहासकार—अपनी समुदायों के जीवित अभिलेखागार की तरह कार्य करते हैं, जो मिथकों, लोककथाओं, अनुष्ठानों और पारिस्थितिक ज्ञान को आगे बढ़ाते हैं।

उदाहरण के लिए, खासी लोगों की लोककथाएं अक्सर जंगल के साथ सामंजस्य के विषय को दर्शाती हैं, जबकि ताई-खामती भिक्षु बौद्ध कहावतों को जनजातीय कथाओं के साथ मिलाकर सुनाते हैं। इन प्राचीन परंपराओं और कहानी कहने की कला को युवाओं की पहलों से जोड़कर पुनर्जीवित किया जा सकता है। डिजिटल उपकरणों और तकनीकों के उपयोग से ये कहानी कहने वाले क्लब लोककथाओं, लोक संगीत, स्थानीय कला और नृत्य पर डिजिटल अभिलेखागार तैयार कर सकते हैं और इसे आम लोगों के लिए ओपन सोर्स बना सकते हैं। इससे उस क्षेत्र के स्थानीय इतिहास और परंपराओं पर जागरूकता बढ़ेगी।

साथ मिलकर, ये कथावाचक संस्कृतियों के बीच एक जन-केंद्रित पुल का काम करेंगे, दिखाएंगे कि मौखिक विरासत कैसे सहानुभूति, लचीलापन और सतत पर्यटन को बढ़ावा देती है। दोनों क्षेत्रों के कथावाचकों के बीच सहयोग स्वदेशी आवाज़ों को और सशक्त करेगा और नैतिक सांस्कृतिक आदान-प्रदान की नई लहर को प्रेरित करेगा।

खेल कूटनीति के माध्यम से युवाओं की भागीदारी

साझा खेल रुचियों के माध्यम से भारत और ताइवान सद्भावना बना सकते हैं, सांस्कृतिक समझ को बढ़ावा दे सकते हैं और युवाओं की भागीदारी सुनिश्चित कर सकते हैं। बैडमिंटन, टेबल टेनिस, वॉलीबॉल और एथलेटिक्स जैसे सामान्य खेल मैत्रीपूर्ण प्रतियोगिताओं, प्रशिक्षण शिविरों और आदान-प्रदान के लिए स्वाभाविक मंच प्रदान करते हैं।

इसके अलावा, पारंपरिक खेलों की समृद्ध धरोहर जैसे थांग-टा (पारंपरिक मणिपुरी मार्शल आर्ट) पूर्वोत्तर भारत से और ताइवान की जनजातीय समुदायों का पारंपरिक तीरंदाजी, जमीनी स्तर की सांस्कृतिक कूटनीति को मजबूत करने के लिए इस्तेमाल की जा सकती है। संयुक्त खेल महोत्सव, युवा टूर्नामेंट और विश्वविद्यालय स्तर की चैंपियनशिप गहरे लोगों से लोगों के जुड़ाव और सॉफ्ट पावर के सतत, गैर-राजनीतिक रूप का मार्ग प्रशस्त कर सकती हैं।

स्वदेशी खेल प्रतियोगिताएं नई सांस्कृतिक कड़ी को मजबूत करने और भारत तथा ताइवान दोनों के स्वदेशी जनजातियों की परंपराओं को संरक्षित करने में मदद कर सकती हैं।

“स्वदेशी खेल प्रतियोगिताएँ भारत और ताइवान के बीच नई सांस्कृतिक जुड़ाव को बढ़ावा देने में मदद कर सकती हैं और दोनों देशों की स्वदेशी जनजातियों की परंपराओं को भी संरक्षित कर सकती हैं। “

-डॉ. संपा कुंडू
इस आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं और जरूरी नहीं कि वे प्रकाशन, द इंडो-पैसिफिक पॉलिटिक्स के विचारों को प्रतिबिंबित करते हों।

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