लेखक:कमलेश के अग्निहोत्री/अनुवादक:आदित्य श्रीवास्तव
चीन की राज्य परिषद ने 12 मई 2025 को “नए युग में चीन की राष्ट्रीय सुरक्षा” शीर्षक से एक श्वेत पत्र जारी किया। इस दस्तावेज़ का पूरा पाठ फिलहाल केवल चीनी भाषा में उपलब्ध है, जबकि अंग्रेज़ी में केवल इसका संक्षिप्त सारांश सार्वजनिक किया गया है। इस सारांश में चीन ने स्वयं को एक जिम्मेदार और स्थिरता लाने वाली ताक़त के रूप में पेश करने की कोशिश की है, मानो वह अव्यवस्थित होते विश्व में शांति और संतुलन बनाए रखने वाला देश हो। लेकिन पुरानी कहावत है कि असली तस्वीर हमेशा बारीकियों में छिपी होती है। यही कारण है कि अमेरिका स्थित चीन विशेषज्ञ डॉ. एंड्रयू एरिक्सन द्वारा उपलब्ध कराए गए अंग्रेज़ी अनुवाद को गहराई से पढ़ा गया ताकि चीन की सोच और उसकी सुरक्षा रणनीति को समझा जा सके।
ताइवान आज भी चीन के लिए सबसे बड़ा और नज़दीकी विवाद बना हुआ है। हाल ही में जारी श्वेत पत्र में चीन ने अपने पुराने रुख़ को दोहराते हुए साफ कहा है कि चीन किसी भी व्यक्ति, संगठन या राजनीतिक दल को किसी भी समय और किसी भी रूप में अपनी भूमि को अलग करने की इजाज़त नहीं देगा। इस दस्तावेज़ में जब ‘Taiwan’ शब्द को खोजा गया तो यह कुल 12 बार सामने आया। हर बार इसका उल्लेख चीन की सख़्त नीति और “पुनर्एकीकरण” यानी ताइवान को अपने साथ मिलाने की योजना के संदर्भ में किया गया है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की नई रणनीति भी अब ताइवान मुद्दे को हल करने और उसके लिए ठोस नीतियाँ बनाने पर ही केंद्रित है।
श्वेत पत्र में एक और संदर्भ उन बाहरी ताक़तों का दिया गया है, जो जानबूझकर “ताइवान कार्ड” खेल रही हैं और चीन के आंतरिक मामलों में दखल देकर ताइवान जलडमरूमध्य, दक्षिण चीन सागर और पूर्वी चीन सागर में अशांति फैला रही हैं। चीन ने सीधे तौर पर ताइवान पर आरोप लगाया है कि स्वतंत्रता समर्थक ताक़तें अपने अलगाववादी रुख पर अड़ी हुई हैं और लगातार उकसावे की कार्रवाई कर रही हैं। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि ताइवान का पुनर्एकीकरण कब और किस रूप में होगा, लेकिन बीजिंग इस बीच हर संभव रास्ते अपनाकर ताइवान को अलग-थलग करने की कोशिश कर रहा है। श्वेत पत्र में यह भी कहा गया है कि ताइवान चीन का ही एक प्रांत है और उसे संयुक्त राष्ट्र या अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों में शामिल होने का कोई आधार, कारण या अधिकार नहीं है। यह बयान चीन की वास्तविक मंशा को साफ़ तौर पर दिखाता है।
कभी-कभी चीन की सैन्य ताक़त का आक्रामक प्रदर्शन और उसके साथ-साथ मीडिया में दी जाने वाली बेहद धमकी भरी भाषा दुनिया के सुरक्षा विशेषज्ञों को यह सोचने पर मजबूर कर देती है कि कहीं ताइवान के पुनर्एकीकरण का भयावह परिदृश्य अब बहुत क़रीब तो नहीं आ गया। यह चर्चा तो इस सदी की शुरुआत से ही चल रही है, लेकिन अब इसकी आशंका और गहरी होती जा रही है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ग्लोबल टाइम्स में 14 अक्तूबर 2024 को प्रकाशित एक लेख था, जो ताइवान के राष्ट्रपति लाई द्वारा 10 अक्तूबर 2024 को दिए गए पहले राष्ट्रीय दिवस भाषण के सिर्फ चार दिन बाद छपा। यह लेख उसी समय छापा गया जब चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी और अन्य समुद्री बल ताइवान और उसके आसपास के द्वीपों के समुद्र क्षेत्रों में JOINT SWORD 2024B नामक बड़ा सैन्य अभ्यास कर रहे थे। इस लेख की भाषा बेहद डराने वाली थी, जिसमें लिखा गया था कि “ताइवान की स्वतंत्रता चाहने वालों के सिर पर दो तलवारें लटकी हैं — एक सैन्य सज़ा की और दूसरी न्यायिक सज़ा की।” यह बयान जितना कठोर था, उतना ही भविष्य के लिए खतरनाक संकेत भी देता था।
ताइवान जलडमरूमध्य और उसके चारों ओर चीन के सैन्य अभ्यास अब बेहद चिंताजनक रूप ले चुके हैं। अगस्त 2022 में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की अध्यक्ष नैन्सी पेलोसी की ताइवान यात्रा के बाद से ही इन अभ्यासों का दायरा, पैमाना, तीव्रता और आवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है। तब से चीनी वायु सेना के विमान लगभग रोज़ाना ही ताइवान के वायु रक्षा पहचान क्षेत्र (ADIZ) का उल्लंघन कर रहे हैं। वर्ष 2024 में चीन ने दो बड़े JOINT SWORD अभ्यास किए — एक मई में राष्ट्रपति शपथ ग्रहण समारोह के दौरान और दूसरा अक्तूबर में ताइवान के राष्ट्रीय दिवस समारोह के समय। इन अभ्यासों ने साफ़ तौर पर चीन के नेतृत्व की विरोधी और आक्रामक नीति को उजागर किया। यही रुझान इस साल भी जारी रहा है। 1 और 2 अप्रैल 2025 को चीन ने STRAIT THUNDER 2025A नामक अभ्यास किया, जिसका घोषित उद्देश्य “महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर कब्ज़ा करना और सामरिक रास्तों को नियंत्रित करना” था।
ताइवान के चारों ओर चीन के बढ़ते सैन्य अभ्यासों की रफ़्तार और उनकी गंभीरता को अगर चीन के उस संकल्प के साथ देखा जाए, जिसमें उसने 2022 के ताइवान श्वेत पत्र में “पुन: एकीकरण” की संभावना और उपयुक्त समय सीमा का ज़िक्र किया था, तो यह वैश्विक सुरक्षा समुदाय के लिए बेहद गंभीर संकेत है। श्वेत पत्र में जिस 2027 की समय-सीमा का उल्लेख किया गया था, उसी अवधि को अमेरिकी इंडो-पैसिफिक कमांड के कई एडमिरल्स ने भी मीडिया में संभावित संकट की खिड़की बताते हुए बार-बार दोहराया है। इस कारण पूरी दुनिया में चिंता और अधिक बढ़ गई है।
भविष्य में इस भयावह घटना के सच होने की संभावना को देखते हुए — जिसका ज़िक्र कई आधिकारिक "व्हाइट पेपर्स" में साफ तौर पर किया गया है और जिसकी झलक चीनी सेना के इरादों में भी मिलती है — ताइवान और पूरी दुनिया को इसके लिए गंभीर तैयारी करनी होगी। इस तैयारी का पहला कदम उस क्षेत्र की गहरी समझ होना चाहिए, जहाँ से यह खतरा सबसे अधिक सामने आ सकता है — यानी समुद्री क्षेत्र की निगरानी (Maritime Domain Awareness - MDA)। ताइवान की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियाँ इस दिशा में काम कर रही हैं, लेकिन सबसे बेहतर रणनीति यह होगी कि ताइवान समान विचारधारा वाले देशों और सहयोगियों के साथ मिलकर काम करे। इससे सामूहिक प्रयासों का फायदा सभी को मिलेगा और सुरक्षा को और मजबूत किया जा सकेगा।
अंतरिक्ष आधारित समुद्री निगरानी तकनीक (MDA) आज सुरक्षा ढांचे का अहम हिस्सा बन चुकी है। इसकी खासियत यह है कि यह बड़ी क्षेत्रीय कवरेज देती है, अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित करती है और कम समय में सटीक जानकारी उपलब्ध कराती है। ताइवान का उद्देश्य भी यही है कि वह अंतरिक्ष क्षेत्र का अधिकतम उपयोग करके अपनी MDA क्षमता को मजबूत बनाए। यह भी सर्वविदित है कि भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम बेहद सक्रिय और सफल है। भारत ने रॉकेट निर्माण, उपग्रह तैयार करने, विभिन्न कक्षाओं में प्रक्षेपण सेवाएँ, उपग्रह पेलोड और जमीनी सेवाओं जैसे पूरे क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल की हैं।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अन्य देशों के लिए अपनी सेवाओं तक पहुँच आसान बनाने के उद्देश्य से न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) नामक एक अलग कॉर्पोरेट निकाय भी बनाया है। इसका मकसद यही है कि अंतरिक्ष सेवाएँ दुनिया के देशों को बहुत कम लागत पर उपलब्ध कराई जा सकें। भारतीय अंतरिक्ष उद्योग के इस पारिस्थितिकी तंत्र से कई भरोसेमंद स्टार्ट-अप भी उभरे हैं। ताइवान पहले से ही इनमें से कुछ स्टार्ट-अप के साथ संपर्क और सहयोग कर रहा है। यही वह क्षेत्र है, जहाँ भारत और ताइवान के बीच सार्थक और परस्पर लाभकारी सहयोग की असली संभावनाएँ मौजूद हैं।
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कमलेश के.अग्निहोत्री नेशनल मैरिटाइम फाउंडेशन, नई दिल्ली में सीनियर फेलो हैं। वे MOFA ताइवान फेलो-2024 भी रह चुके हैं, जहाँ उन्होंने नेशनल चेंगची यूनिवर्सिटी में पश्चिमी प्रशांत महासागर की समुद्री सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर शोध किया, जिसमें ताइवान जलडमरूमध्य संबंध भी शामिल थे।
इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। ये जरूरी नहीं कि द इंडो-पैसिफिक पॉलिटिक्स प्रकाशन के विचारों को भी दर्शाते हों।