
लेखक: वीनस उपाध्याय/ अनुवादक: काश्वी चतुर्वेदी
बीस साल पहले जब हुआंग मेयू अकेले नई दिल्ली आईं बॉलीवुड नृत्य सीखने, तो उन्हें अक्सर कॉनॉट प्लेस की दीवारों पर लगे ‘गुमशुदा’ पोस्टरों पर अपना चेहरा दिखाई देने का डर था। बीतते समय के साथ, आज वे एक प्रशिक्षित ओडिसी नर्तकी बन चुकी हैं, जिनका ताइपे में एक डांस स्टूडियो है जहाँ वे युवा ताइवानी लोगों को भारतीय नृत्यों की शिक्षा देती हैं और रामायण व शिव पर आधारित अपने नृत्य के माध्यम से शास्त्रीय भारतीय संस्कृति का प्रचार करती हैं। मेयू की ताइवानी माँ इस बात पर चकित हैं कि उनकी बेटी में कैसे “भारतीय आत्मा” समा गई, और मेयू कहती हैं कि उनका जीवन नृत्य को समर्पित है—उन्होंने धीरे-धीरे समझा कि शास्त्रीय भारतीय नृत्य “ईश्वर के लिए नृत्य” प्रदर्शित करता है। वे कहती हैं कि वे ईश्वर के लिए नृत्य करती हैं।
आज की भौतिकवादी-प्रधान समाज में “ईश्वर के लिए नृत्य” की भावना को शायद ही कोई समझ पाए या अक्सर यह भाव ही गलत समझ लिया जाता है। पर जब कोई किसी विदेशी समाज में सबसे कम लोकप्रिय कला में विलीन हो, तो यह और भी मुश्किल हो जाता है। इस यात्रा में अकेलापन हो सकता है, और यह यात्रा कला-संस्कार के प्रति गहरी समर्पण की मांग करती है। मेयू इसे—“नृत्य से विवाहित होना” कहती हैं। और “ईश्वर के लिए नृत्य” की अवधारणा भारतीय शास्त्रीय नर्तकों के लिए कुछ नई बात नहीं है। मेयू इस बात की गहराई से चर्चा करती हैं कि कैसे एक ओडिसी नर्तकी का हर अलंकरण किसी ना किसी रूप में ईश्वर या ओडिशा के किसी पुरातन मंदिर का प्रतिनिधित्व करता है।
“आप जो फूल सिर पर देखें, वह मुख्यत: कमल का फूल दर्शाता है, जिसे हजार पंखुड़ियों वाला कमल कहा जाता है, जो सिर के चक्र से ऊपर स्थित ऊर्जा का केंद्र है। यह सूर्य मंदिर (कोणार्क) की किरणों की तरह भी है। जो लंबा हिस्सा पीठ के केंद्र से निकलता है—जिसे ताहीया कहा जाता है—वह भगवान जगन्नाथ के मंदिर की शिखर संरचना का प्रतीक है। सब कुछ आस्था, विश्वास और मंदिरों से जुड़ा है।” — यह बातें मेयू ने ताइचुंग रेलवे स्टेशन के कैफे में साझा करते हुए कही।

बॉलीवुड का आकर्षण और शास्त्रीय नृत्य का अध्ययन
बीस साल पहले, भारत पहुंचने से पहले, मेयू संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘देवदास’ के सिनेमाई सेट्स, नृत्य और सौंदर्य से अभिभूत थीं। उस समय उन्हें बॉलीवुड की खूबसूरती इतनी आकर्षक लगी कि उन्होंने ‘ऐश्वर्या राय’ बनने का सपना देखा। वे कहती हैं, “देवदास ताइवान में बहुत लोकप्रिय था, मैं ऐश्वर्या राय बनना चाहती थी।” उस समय वे पहले बेली डांस, चीनी शास्त्रीय नृत्य, और अन्य नृत्य रूपों की संधी का अभ्यास कर रही थीं।
सैन फ्रांसिस्को में एक जनजातीय नृत्य समारोह में उनकी मुलाकात कोलेना शक्ति नामक एक ग्रीक नर्तकी से हुई, जो भारतीय नृत्य रूपों की समर्थक थीं। उन्होंने बाद में राजस्थान के पुष्कर में पुराने रंग नाथ मंदिर में आधारित “शाक्ति स्कूल ऑफ डांस” की स्थापना की। मेयू ने 2007 में ताइपेई में एक तीन सप्ताह का नृत्य कार्यशाला आयोजित करने के लिए उन्हें आमंत्रित किया था।
उससे कुछ साल पहले, एक भारतीय इंजीनियर की पत्नी के माध्यम से उन्हें भरतनाट्यम से परिचय मिला। 2010 में, वे माधुमिता राउत से ओडिसी सीखने लगीं—जो पद्मश्री गुरु मयाधर राउत की पुत्री हैं, जिन्होंने शास्त्रीय नृत्य में सूत्रबद्ध (शास्त्र-आधारित) ज्ञान के माध्य से ओडिसी के पुनरुद्धार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
गुरु मयाधर ने 1959 में आधुनिक ओडिसी का पुनर्निर्माण शुरू करने के लिए ‘जयन्तिका’ नामक एक संघ की स्थापना की थी, जिसमें विद्वान, कलाकार और गुरु शामिल थे। माधुमिता ने मेयू को केवल एक शास्त्रीय नृत्य रूप पर ध्यान केंद्रित करने और उसमें उत्कृष्टता प्राप्त करने की आवश्यकता पर जोर दिया—जो कि किसी भी शास्त्रीय कला के अनुयायी की आध्यात्मिक जरूरत है।
वर्तमान में, उनकी गुरु हैं पद्मचारण देहुरी, एक और प्रमुख ओडिसी कलाकार, जिन्हें वे 2016 में सून यात्सेन विश्वविद्यालय, ताइपेई के थिएटर आर्ट्स विभाग के प्रोफेसर यिन वेईफांग के साथ मिलकर भारतीय शास्त्रीय नृत्य रूप को इस विश्वविद्यालय के छात्रों तक पहुँचाने के लिए आमंत्रित किया था। मेयू चाहती हैं कि ताइवान के किसी विश्वविद्यालय में भारतीय नृत्य को नियमित पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया जाए।
उल्लेखनीय है कि उनका डांस स्टूडियो, शाक्ति स्कूल ऑफ डांस, आज भी युवा ताइवानी लोगों को विभिन्न भारतीय नृत्य रूपों — लोक और समकालीन दोनों — में प्रशिक्षित करता है।

ताइवान में रामलीला की शुरुआत और शिव पुराण आधारित प्रस्तुतियाँ
आज वे ताइवान में कई भारतीय सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के लिए जानी जाती हैं। 2022 में, दिवाली के अवसर पर उन्होंने अपने ताइवानी छात्रों के साथ रामलीला का दस मिनट का संस्करण मंचित किया। उन्हें रावण का किरदार निभाने के लिए किसी की तलाश में काफी संघर्ष करना पड़ा और अंततः उन्हें एक भारतीय प्रवासी मिला। उन्होंने न केवल मंचन के लिए पोशाकें तैयार कीं बल्कि हनुमान के गदा जैसे हथियार भी स्वयं बनाए।
“प्रदर्शन के बाद एक भारतीय दर्शक मेरे पास आया और मुझे 2000 NTD (ताइवानी डॉलर) दे दिया—और उसने कहा कि उसने ताइवान में पहली बार ऐसा प्रदर्शन देखा है।” मेयू कहती हैं कि जिस गहराई में यह सांस्कृतिक संदेश निहित था, उसे एक साधारण ताइवानी शायद टिकट के पैसे समझ सकता था, लेकिन केवल एक भारतीय ही उस 2000 NTD को एक सांस्कृतिक सम्मान के रूप में समझ सकता था।
वर्तमान में वे शिवपुराण की कथाओं का संगीत नाट्य रूप तैयार कर रही हैं। 2023 में, उन्होंने ताइपेई के शिनझुआंग संस्कृति एवं कला केंद्र में दो बार शिव–पार्वती की कथा मंचित की। मेयू बताती हैं कि इस समय पूरे ताइवान के विभिन्न काउंटियों में 10–15 छोटे नृत्य समूह भारतीय नृत्य रूपों का अभ्यास कर रहे हैं। उनके कई छात्र रहे, लेकिन मात्र आठ ताइवानी छात्रों ने ओडिसी को गंभीरता से अपनाया। वे चाहती हैं कि ऐसे और अधिक छात्र आएँ, और उनकी इच्छा है कि भारतीय संस्कृति और नृत्य को ताइवान में और अधिक लोकप्रियता मिले।
वे कहती हैं कि वे शिव भक्त हैं और अपने नाम के साथ ‘शक्ति’ शब्द जोड़ती हैं—अतः मेयू शक्ति. वे अंतर-सांस्कृतिक थिएटर में सक्रिय रूप से शामिल हैं, और भारतीय शास्त्रीय परंपराओं को ताइवान के शैक्षणिक और मंचीय कला जगत में एकीकृत करने के लिए अथक प्रयास कर रही हैं। राष्ट्रीय सून यात्सेन विश्वविद्यालय के थिएटर आर्ट्स विभाग के साथ एक सहयोग में, उन्होंने चीनी भाषा बोलने वाले दर्शकों के लिए पहला संस्कृत नाटक—“ मृच्चकटिक”—सह-निर्मित किया।
"यह प्रस्तुति एक दुर्लभ संगम के उपलब्धि की थी—जो शास्त्रीय भारतीय नाट्यशास्त्र और आधुनिक मंदारिन-भाषी थिएटर का था—और इसने भारतीय प्राचीन सांस्कृतिक विरासत की संभावना को नए और विविध दर्शकों तक पहुँचाने की क्षमता को उजागर किया।” – यह मेयू का कथन है।