तियानजिन एस.सी.ओ के बाद: चीन की दृष्टि में भारत कहाँ फिट बैठता है?


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 01 सितंबर, 2025 को चीन के तियानजिन में एससीओ शिखर सम्मेलन में पहुंचे। (Pic courtesy PIB)

लेखिका: वीनस उपाध्याय/ अनुवादक: आदित्य श्रीवास्तव

तियानजिन एससीओ का समय संयोगवश ऐसे समय आया जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत पर 50 प्रतिशत दंडात्मक शुल्क लगा दिया था—मोदी के चीन शिखर सम्मेलन में पहुँचने और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मिलने के मात्र तीन दिन पहले।

काफी चर्चा है कि चीन, अमेरिका के शुल्क प्रहार से उबरने में भारत की मदद के लिए हाथ बढ़ा सकता है। साथ ही, मोदी और शी की रविवार की मुलाकात के बाद जारी बयान में “साझेदार, प्रतिद्वंद्वी नहीं” वाक्यांश को लेकर भी व्याख्याओं की होड़ लगी है। यह शब्दावली दोनों पक्षों के बयानों में समान रूप से दिखाई दी और इसका संदर्भ ट्रम्प के शुल्क निर्णय से भी जुड़ता है।

चीनी विदेश मंत्रालय द्वारा जारी बयान में मोदी को उद्धृत करते हुए कहा गया:
“विश्व अर्थव्यवस्था में अनिश्चितताओं को देखते हुए भारत और चीन जैसे प्रमुख अर्थतंत्रों के लिए सहयोग बढ़ाना आवश्यक है।”

दोनों पक्षों ने “रणनीतिक स्वायत्तता” शब्द का प्रयोग किया। भारत ने कहा कि “भारत–चीन संबंधों को किसी तीसरे देश के दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए” जबकि चीन ने इसे अलग शब्दों में इस प्रकार रखा कि “द्विपक्षीय संबंध किसी तीसरे पक्ष से प्रभावित नहीं हैं।”

आधिकारिक बयानों में शब्दों का चयन यूँ ही नहीं होता। दिलचस्प है कि अंतर स्पष्ट है। व्यापार पर बात करते हुए भारत की प्रधानमंत्री कार्यालय और विदेश मंत्रालय ने दोनों ही यह कहा:
“आर्थिक और व्यापार संबंधों पर, दोनों पक्षों ने विश्व व्यापार को स्थिर करने में अपनी अर्थव्यवस्थाओं की भूमिका को स्वीकार किया। उन्होंने द्विपक्षीय व्यापार और निवेश संबंधों को राजनीतिक और रणनीतिक दिशा से बढ़ाने तथा व्यापार घाटे को कम करने की आवश्यकता पर बल दिया।”

चीनी पक्ष ने मोदी को उद्धृत करते हुए “दीर्घकालिक दृष्टिकोण से द्विपक्षीय संबंधों के विकास” की बात कही, लेकिन व्यापार घाटे का कोई उल्लेख नहीं किया—जो लगभग 100 अरब डॉलर है और भारत के कुल व्यापार असंतुलन का 35 प्रतिशत बनता है। यह आश्चर्यजनक है कि दोनों पक्ष एक ही बैठक की व्याख्या और दस्तावेज़ीकरण इतने अलग तरीके से करते हैं!

हकीकत की जाँच!

सोमवार को एससीओ शिखर सम्मेलन समाप्त होने के बाद प्रधानमंत्री मोदी नई दिल्ली लौट आए। उन्होंने 3 सितम्बर को द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति की 80वीं वर्षगांठ पर होने वाली चीन की विजय परेड में भाग नहीं लिया। इस परेड में व्लादिमीर पुतिन, उत्तर कोरिया के किम जोंग-उन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेझेश्कियन जैसी उच्च-स्तरीय मौजूदगी रहेगी।

मोदी जापान की सफल यात्रा के बाद सीधे एससीओ शिखर सम्मेलन पहुँचे थे। शिखर सम्मेलन में उनकी मौजूदगी और संदेश, तथा बुधवार की परेड से अनुपस्थिति—दोनों ही पश्चिम और वैश्विक दक्षिण को स्पष्ट संकेत भेजते हैं। यह छवि बनती है कि भारत आत्मनिर्णय पर आधारित दृष्टिकोण अपनाता है और अपने हितों को प्राथमिकता देता है। विशेष रूप से चीन के साथ द्विपक्षीय वार्ताओं में भारत ने यह स्पष्ट किया कि उसकी प्राथमिकता शांतिपूर्ण एवं स्थिर सीमा, संतुलित व्यापार और बीजिंग से अधिक निवेश है।

चीन और अमेरिका के प्रति भारत की यथार्थवादी सोच पाकिस्तान से भी प्रभावित है। चीन और अमेरिका, दोनों ही इस समय पाकिस्तान को लुभाने में लगे हैं। अमेरिका और पाकिस्तान ने 30 जुलाई को पाकिस्तान के तेल भंडार के संयुक्त विकास पर नया समझौता किया, जिसे राष्ट्रपति ट्रम्प ने “दीर्घकालिक ऊर्जा साझेदारी की महत्वपूर्ण शुरुआत” बताया। इसके साथ ही ट्रम्प ने पाकिस्तान के लिए घोषित व्यापार शुल्क को 29 प्रतिशत से घटाकर 19 प्रतिशत कर दिया।

20 अगस्त को पाकिस्तान ने तेल और गैस की खोज हेतु अमेरिकी कंपनियों को नए बोली दौर में आमंत्रित किया। कभी बिगड़े हुए अमेरिका–पाकिस्तान संबंध अब सकारात्मक दिख रहे हैं—जो भारत–अमेरिका संबंधों के हालिया परिदृश्य से बिल्कुल विपरीत है।

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 01 सितम्बर 2025 को चीन के तियानजिन में आयोजित एससीओ शिखर सम्मेलन के पारिवारिक फोटो सत्र में। (Pic courtesy PIB)

एससीओ बयानों में ‘आतंकवाद’ का प्रयोग!

मोदी ने अप्रैल में हुए पहलगाम हमले को एससीओ शिखर सम्मेलन के एजेंडे में उठाया और सोमवार को जारी घोषणा पत्र में भारत की चिंताओं को स्थान मिला। हालांकि रविवार की द्विपक्षीय बैठक के बाद जारी चीनी बयान में “आतंकवाद” शब्द पूरी तरह अनुपस्थित था, जबकि भारतीय बयान में इसका उल्लेख हुआ। यह कोई संयोग नहीं हो सकता!

मोदी ने सोमवार को अपने संबोधन में कहा: “भारत पिछले चार दशकों से आतंकवाद का शिकार रहा है। हाल ही में हमने पहलगाम हमले में आतंकवाद का सबसे भयावह रूप देखा। इस दुख की घड़ी में हमारे साथ खड़े मित्र देशों का मैं आभार प्रकट करता हूँ।”

घोषणा पत्र में कहा गया: “आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में दोहरे मापदंड अस्वीकार्य हैं।”

“सदस्य देशों ने 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले की कड़ी निंदा की। उन्होंने मृतकों और घायलों के परिवारों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की और कहा कि ऐसे हमलों के अपराधियों, आयोजकों और प्रायोजकों को न्याय के कटघरे में लाया जाना चाहिए।”

इनका प्रतिबिंब मोदी और शी की रविवार की द्विपक्षीय बैठक के भारतीय बयान में भी दिखाई दिया।
प्रधानमंत्री कार्यालय और विदेश मंत्रालय के अनुसार: “दोनों नेताओं ने आतंकवाद और निष्पक्ष व्यापार जैसे द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर साझा दृष्टिकोण बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया।”

भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने प्रेस वार्ता में पुष्टि की कि प्रधानमंत्री ने शी जिनपिंग के साथ “सीमापार आतंकवाद” का मुद्दा उठाया और चीनी पक्ष ने विभिन्न तरीकों से समर्थन देने की बात कही।

लेकिन चीनी बयान में “आतंकवाद” शब्द का कोई प्रयोग नहीं हुआ—संभवतः पाकिस्तान को ध्यान में रखते हुए। भारत ने बार-बार पहलगाम हमले का दोष पाकिस्तान पर लगाया और उसके बाद पाकिस्तान में दंडात्मक हमले भी किए। दोनों देशों के बीच इस घटना के बाद गंभीर टकराव हुआ।

इससे भी उल्लेखनीय है 22 अगस्त को चीन के विदेश मंत्री वांग यी और पाकिस्तान के फील्ड मार्शल सैयद असीम मुनीर की बैठक का चीनी बयान। वांग यी, नई दिल्ली में भारतीय विदेश मंत्री सुब्रहमण्यम जयशंकर से मिलने के बाद पाकिस्तान गए थे।

वांग यी और असीफ़ मुनीर की बैठक के चीनी बयान में कहा गया कि ‘उच्च गुणवत्ता के साथ चीन–पाकिस्तान आर्थिक गलियारे का एक उन्नत संस्करण 2.0 संयुक्त रूप से बनाया जाए। नए युग में साझा भविष्य वाले एक और अधिक घनिष्ठ पाकिस्तान समुदाय के निर्माण में तेजी लाने के लिए सकारात्मक योगदान दिया जाए।

वांग यी ने यह भी कहा कि चीन और पाकिस्तान “दोनों ही पूर्वी सभ्यता के अंग” हैं। यही बात उन्होंने जयशंकर से भी कही थी।

बदलती परिस्थितियों में भारत को एहसास है कि न तो चीन और न ही अमेरिका उसकी प्रगति को बिना शर्त समर्थन देंगे। भारत को लगातार आत्म-सिद्धि और कीमत चुकानी होगी। यहीं रूस के साथ भारत के संबंध महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

यह भारत को रूस–यूक्रेन युद्ध रोकने की अनूठी स्थिति में रखता है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की ने इसीलिए शनिवार को मोदी को फोन किया, जब वह तियानजिन के लिए रवाना होने वाले थे। इससे पहले राष्ट्रपति पुतिन ने भी मोदी को फोन किया था—ट्रम्प से अलास्का में मुलाकात से पहले और बाद में।

अब देखना होगा कि भारत किस प्रकार यूक्रेन और रूस के बीच संतुलन बनाए रखते हुए अमेरिका के युद्ध-प्रेरणा संबंधी आरोपों का सामना करता है। चीन और अमेरिका, दोनों की निगाहें मोदी और भारत पर हैं।

वीनस उपाध्याय ताइवान विदेश मंत्रालय (MOFA) की 2025 फैलो और ताइचुंग स्थित नेशनल चुंग-हसिंग यूनिवर्सिटी (NCHU) के कॉलेज ऑफ लॉ एंड पॉलिटिक्स में विज़िटिंग स्कॉलर हैं। यह लेख “मध्य-2025 और वैश्विक बदलाव” शीर्षक श्रृंखला का पहला लेख है।

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