एस.डी. प्रधान इससे पहले भारत की संयुक्त खुफिया समिति के अध्यक्ष रह चुके हैं। वे देश के उपराष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी रहे हैं। उन्होंने 2008–2010 के बीच खुफिया तंत्र की समीक्षा के लिए गठित टास्क फोर्स ऑन इंटेलिजेंस मैकेनिज्म की अध्यक्षता की। उन्होंने पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला में रक्षा अध्ययन और इतिहास विभाग में अध्यापन किया है। वे अमेरिका के इलिनोइस विश्वविद्यालय में हथियार नियंत्रण और निरस्त्रीकरण अध्ययन विभाग में विज़िटिंग प्रोफेसर भी रहे हैं।
श्री प्रधान नियमित रूप से टाइम्स ऑफ इंडिया में “द चाणक्य कोड” शीर्षक से कॉलम लिखते हैं और इंडो–पैसिफिक क्षेत्र की राजनीति पर गहरी नज़र रखते हैं। ‘द इंडो–पैसिफिक पॉलिटिक्स’ ने उनसे भारत–ताइवान संबंधों पर बातचीत की—यह जानने के लिए कि आज ये संबंध पहले से कैसे अलग हैं और भविष्य के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं। यह साक्षात्कार मूल रूप से 1 मार्च 2025 को लिया गया था और इस महीने विशेषज्ञ की नई टिप्पणियों के साथ अपडेट किया गया है।
इस साक्षात्कार में श्री प्रधान भारत–ताइवान संबंधों को तीन स्तंभों—“विकास, अर्थव्यवस्था और संस्कृति”—के समग्र ढांचे में रखते हैं। इस बातचीत में यह दृष्टिकोण और यह प्रश्न कि यदि चीन ताइवान पर हमला करता है तो भारत की प्रतिक्रिया क्या होगी, विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
द इंडो–पैसिफिक पॉलिटिक्स: आज भारत–ताइवान संबंधों के सबसे महत्वपूर्ण पहलू क्या हैं?
एस.डी. प्रधान: मूल रूप से हमारे संबंधों के तीन आयाम हैं। पहला विकास, दूसरा अर्थव्यवस्था और तीसरा संस्कृति। आप देखिए, ताइवान चीन का सबसे पुराना हिस्सा है—वह “वास्तविक चीन” जिसके साथ भारत के सभ्यतागत संबंध रहे हैं। पीआरसी (चीन जनवादी गणराज्य) द्वारा मुख्य भूमि पर कब्ज़ा करने के बाद, भारत–ताइवान संबंध लगभग नहीं के बराबर थे। यह संबंध 1991 में शुरू हुए, जब भारत ने आर्थिक उदारीकरण किया और यह समझा कि संस्कृति और अर्थव्यवस्था के लिए अपनी नीति पर दोबारा विचार करना ज़रूरी है।
इसके बाद हमने ताइवान की ओर देखना शुरू किया और 1995 में प्रतिनिधि कार्यालय स्थापित किए। यानी सांस्कृतिक और आर्थिक केंद्र बहुत देर से बने। 2006 में द्विपक्षीय व्यापार मात्र 2 अरब डॉलर था, जो आज लगभग साढ़े चार गुना हो चुका है। यह स्पष्ट रूप से बढ़ा है।
वास्तव में, जब चीन ताइवान पर दबाव बढ़ा रहा था, उसी दौरान भारत–ताइवान संबंध भी मज़बूत हुए। हमें एहसास हुआ कि ताइवान के साथ संबंध बनाना ज़रूरी है। यदि आपको याद हो, तो 2011 के बाद से हमने अपने आधिकारिक दस्तावेज़ों में “वन चाइना पॉलिसी” का उल्लेख करना बंद कर दिया। 2020 में भारत के दो सांसदों ने ताइवान की तत्कालीन राष्ट्रपति त्साई इंग–वेन के शपथ–ग्रहण समारोह में भाग लिया। इसके बाद हमारे संबंध और आगे बढ़े।
कृषि सहित कई क्षेत्रों में समझौते हुए, सीमा शुल्क में रियायतें दी गईं। ताइवान द्वारा बनाए जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों में भारत की गहरी रुचि रही है, जिसके चलते अब तक लगभग 10 समझौते किए जा चुके हैं। श्रम से जुड़ा एक समझौता भी है, हालांकि वह बहुत अच्छी तरह काम नहीं कर पाया है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इंडो–पैसिफिक रणनीति में ताइवान एक अहम इकाई बना हुआ है। क्वाड देशों की “मुक्त और खुला इंडो–पैसिफिक” पहल में ताइवान की भूमिका को लेकर एक व्यापक सहमति है।
हम सभी चीनी अतिक्रमण और आक्रामकता को लेकर चिंतित हैं और चाहते हैं कि यह रुके। यह क्वाड के सभी सदस्यों और छोटे देशों की साझा चिंता है। रणनीतिक समुदाय का मानना है कि यदि चीन ताइवान पर कब्ज़ा कर लेता है, तो क्षेत्र में तनाव और बढ़ेगा, क्योंकि चीन की विस्तारवादी भूख और तेज़ हो जाएगी और वह अन्य छोटे देशों को भी निशाना बना सकता है। भारतीय रणनीतिक समुदाय का मानना है कि ताइवान को उसी स्थिति में बने रहना चाहिए।
हालांकि हम खुलकर यह नहीं कहते कि “वन चाइना पॉलिसी” बदल गई है, लेकिन व्यवहार में हम ताइवान के साथ व्यापक संबंध विकसित कर रहे हैं।
समस्याएँ भी हैं। सबसे बड़ी चुनौती खुद चीन है, जो बार–बार चेतावनी देता है कि भारत ताइवान के बहुत करीब न जाए। 2020 में चीन ने भारतीय पत्रकारों को ताइवान से जुड़े एक घटनाक्रम को कवर न करने की सलाह दी थी। लेकिन ऐतिहासिक रूप से ताइवान चीन के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहा है। 1911 की क्रांति के बाद मंचू राजवंश को हटाने वाली राष्ट्रवादी सरकार (जो बाद में ताइवान चली गई) ही सत्ता में आई थी। गृहयुद्ध के बाद चीन दो हिस्सों में बंट गया।
अब भारत सेमीकंडक्टर क्षेत्र में रुचि ले रहा है। पहले टाटा और टीएसएमसी के बीच बातचीत हुई थी, लेकिन श्रम और कौशल से जुड़ी समस्याएँ सामने आईं। ताइवान की कंपनियाँ भारतीय श्रम से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं—यह एक चुनौती है। फिर भी सेमीकंडक्टर क्षेत्र में लगभग 10 अरब डॉलर की संभावनाएँ हैं। प्रधानमंत्री मोदी इसमें गहरी रुचि ले रहे हैं और मुझे उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में हम चीन से हटकर एक वैकल्पिक मैन्युफैक्चरिंग चेन स्थापित कर पाएंगे।
भारत की “एक्ट ईस्ट पॉलिसी” और ताइवान की “साउथबाउंड पॉलिसी” में कई समानताएँ हैं। ताइवान के लिए भारत एक महत्वपूर्ण केंद्र बन रहा है, क्योंकि वह चीन से बाहर अपने आर्थिक विस्तार के रास्ते तलाश रहा है। भारत भी इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और आईसीटी उत्पादों को प्राथमिकता दे रहा है, जिनमें ताइवान की विशेषज्ञता है। हमें इन चुनौतियों से शांतिपूर्वक निपटना होगा।
भले ही हम आधिकारिक तौर पर यह न कहें कि “वन चाइना पॉलिसी” को छोड़ दिया गया है, लेकिन व्यवहार में ताइवान के साथ संबंध बनाए रखना हमारे विकास और इंडो–पैसिफिक रणनीति की सफलता के लिए आवश्यक है।
द इंडो–पैसिफिक पॉलिटिक्स: आपने भारत–ताइवान संबंधों के तीन पहलुओं का ज़िक्र किया। क्या इन संबंधों का कोई रणनीतिक पक्ष भी है?
एस.डी. प्रधान: भारतीय रणनीतिक समुदाय मानता है कि यदि ताइवान का चीन द्वारा विलय कर लिया गया, तो भारत को और अधिक समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। इसलिए ताइवान की मौजूदा स्थिति को बनाए रखना ज़रूरी है। इस सोच से ऑस्ट्रेलिया, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश भी सहमत हैं। भले ही दक्षिण कोरिया क्वाड का सदस्य नहीं है, लेकिन हम उससे भी बातचीत कर रहे हैं। सभी चाहते हैं कि ताइवान का चीन में विलय न हो।
लेकिन भू–राजनीतिक और रणनीतिक परिदृश्य बदल रहा है। चीन ताइवान के समुद्री और हवाई क्षेत्र में लगातार घुसपैठ कर रहा है। इसे रोका जाना चाहिए।
एक और दृष्टिकोण यह है कि अमेरिका, खासकर ट्रंप के नेतृत्व में, कहीं अलगाववादी नीति न अपना ले। लेकिन भारतीय रणनीतिक समुदाय मानता है कि यदि “मेक अमेरिका ग्रेट अगेन” का अर्थ वैश्विक प्रभाव बनाए रखना है, तो अमेरिका दक्षिण चीन सागर और इंडो–पैसिफिक क्षेत्र से पीछे नहीं हट सकता।
द इंडो–पैसिफिक पॉलिटिक्स: भारत के अन्य वैश्विक सेमीकंडक्टर साझेदारों की तुलना में ताइवान के साथ साझेदारी कैसे अलग है?
एस.डी. प्रधान: भारत के सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) का उद्देश्य वेफर फैब, डिस्प्ले फैब, पैकेजिंग–टेस्टिंग इकाइयाँ और चिप डिज़ाइन व अनुसंधान को बढ़ावा देना है। इसके तहत डिज़ाइन–लिंक्ड इंसेंटिव योजना भी है। अभी भारत में लगभग ₹1.60 लाख करोड़ के निवेश वाली 10 से अधिक सेमीकंडक्टर परियोजनाएँ स्वीकृत हैं।
ताइवान के साथ साझेदारी कई कारणों से अलग है। पहला, दोनों देशों की क्षमताएँ एक–दूसरे की पूरक हैं। ताइवान के पास निर्माण और सप्लाई–चेन का अनुभव है, जबकि भारत के पास बड़ा बाज़ार, कुशल मानव संसाधन और सरकारी समर्थन है। दूसरा, वैश्विक कंपनियाँ चीन से बाहर विकल्प तलाश रही हैं और भारत इस “चीन–प्लस–वन” रणनीति में एक मज़बूत विकल्प है।
तीसरा, भारत केवल असेंबली नहीं, बल्कि पूरी सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम बनाना चाहता है—डिज़ाइन से लेकर पैकेजिंग तक। चौथा, भले ही भारत और ताइवान के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं, लेकिन आर्थिक सहयोग तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। यह दिखाता है कि व्यापारिक ज़रूरतें राजनीतिक सीमाओं से आगे निकल सकती हैं। मेरे विचार में, यह साझेदारी भविष्य में और मज़बूत होगी।
द इंडो–पैसिफिक पॉलिटिक्स: यदि चीन ताइवान पर आक्रमण करता है, तो भारत का रुख क्या होगा?
एस.डी. प्रधान: यह एक बहुत कठिन सवाल है। भारत युद्ध नहीं चाहता। लेकिन यदि स्थिति बेहद गंभीर हो जाती है, तो कठिन निर्णय लेने पड़ते हैं। ऐसे में अन्य देशों के साथ मिलकर कदम उठाए जा सकते हैं। क्वाड कोई सैन्य गठबंधन नहीं है, लेकिन जब किसी देश पर अत्यधिक दबाव या ज़बरदस्ती होती है, तो अन्य देश उसकी मदद के लिए आगे आते हैं। मुझे भरोसा है कि भारत अपनी पूरी क्षमता से यह सुनिश्चित करने की कोशिश करेगा कि ताइवान अपनी स्वतंत्रता न खोए।